Tuesday, May 3, 2011

बेगाना



सारी उम्र उसे सजाया
तपती धूप
बारिस से बचाया
हंसाया ,रुलाया
जब भी रूठा
मन्नतों से मनाया
भगवान हे साक्षी
खुद से ज्यादा बहलाया
बिश्वास था मुझे
ये  मेरे साथ
हर पल रहा है
स्तब्ध हू देखकर.........
............वो चिता पर जल रहा है

Thursday, October 21, 2010

विवशता

विवशता
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दिन रात
पापी
पेट भरता रहा
प्रसाद का कंद न खा सका
हर पल
माला
जपता रहा
मन का द्वन्द न भगा सका
माया के इस
महाजाल में
परमानन्द न पा सका
काम लोभ मद मोह को
अब तक
ठण्ड न दिला सका
बच्चे को
कृष्ण नाम दिया
स्वयं को
नन्द न बना सका
तुम मेरी
मै तेरा  लिखा
भक्ति का इक
छंद न बना सका
हे प्रभु
ये कैसी विवशता
जिसका अब तक
अंत न आ सका

पहचान कौन

पहचान कौन
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खबर थी
पटना में
एक बच्चे पर
दो ओरतों ने किया दावा
एक थी हिन्दू
दूसरी मुसलवान
मै हुआ हैरान
सोच रहा था
कैसे होगा फैसला
तभी
मेरी चार साल की बेटी
मेरे पास आई
बोली.........
यह तो है बहुत ही आसान
बुलाओ उस बच्चे को
और पूछ लो
उसे
बनाया किसने
अल्लाह या .......भगवान

Wednesday, October 20, 2010

अंतिम इच्छा

अंतिम इच्छा
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उस रात
खोया था जब मै अपने मे
श्रीहरी आये मेरे सपने मे
पूछा
वत्स......
इच्छा क्या है तुम्हारी ?
नासमझ  था
सोचा
सोचकर बताऊंगा
जल्दबाजी मे
गलत चीज
पा जाऊंगा
बोला
थोडा समय दीजिये प्रभु
श्रीहरी बोले
तथास्तु..........
उनके थोड़े समय में
मेरे कई जीवन निकल गए
जब तक गलती का आभास हुआ
राह से पैर फिसल गए
जय हो श्रीला प्रभुपाद
चखाया कृष्ण नाम का स्वाद
अब फिर से मेरी कोशिश  है
की जब
श्रीहरी आये मेरे सपने मे
पाए मुझे
हरिंनाम जपने मे

Tuesday, October 19, 2010

मी मुम्बईकर.

मी मुम्बईकर
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खतरों से खेलने की
आदत सी पड़ गयी है
चलती बस पकड़ना
नशा देने लगी है
ट्रेन से घटती दूरी और
बढती दिल की धढ़कन
मजा देने लगी है
बम धमाकों की आवाज भी
अब नीद न तोड़ सकी है
खून से लथपथ चेहरे
जाने पहचाने लगने लगे है
फिर वही नाकाबंदी
रिवाज सा लगने लगा है
हाथ मे माइक  पकडे
जिन्दगी की रफ़्तार की
तारीफ़ करते  पत्रकार
बीमार से लगने लगे है
.
.
.
मी मुम्बईकर..........आमची मुंबई

प्रगति पथ

प्रगति पथ
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मैंने पूरा पहाढ़ ही
काट डाला
उसे  कोंक्रीट से
पाट डाला
हरे भरे जंगल को साफ़ कर
अपनी प्रगति का परचम
फहरा डाला
भूखे नगे
अभी भी सड़क पर है
उनकी तस्वीरे खींचकर
जिंदगी के बगीचे  को
भावनावो से सींचकर
रेत का महल
बना  डाला
पेट की आग न बुझा पाए
दो टुकड़े चंद्रमा से
पत्थर के ले आये
खुश है सोचकर
की है प्रगति पथ पर
मैंने
इन्सान को
हैवान बना  डाला

ज्ञान -विज्ञानं

ज्ञान -विज्ञानं
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हमारा था
खो दिया
नया क्या पाया ?
अच्छी चीज
मिल बाट के न खा पाए
मिट्टी के सेव बनवाए
सब में बटवाए
इन्द्रिया तृप्त हुई न आत्मा
एक महानुभाव ने कहा
इक पंख विज्ञानं का
दूसरा धार्मिक ज्ञान का
ऊची उडान लगायेंगे
मैंने पूछा
दिशा कैसे पायेंगे ?
रखो दोनों पंख  विज्ञानं के
धर्म की बनाओ पूँछ
जो देगी दिशा
और दूर होगी निशा